Sunday, 8 January 2012

वो यादें मेरे बचपन की

वो यादें मेरे बचपन की अब कितनी अच्छी लगती हैं
वो दादी की उड़ती परियां अब कितनी सच्ची लगती हैं
जब धूल से लथपथ थके हुए हम खेल के घर को आते थे
माँ की गोदी में बैठ के जब हम खूब बताशे खाते थे

शाम को बैठ के दादी माँ जब चोर सिपाही कहती थी
मधुशूदन आते जाते थे और चाँद में परियां रहती थी
स्कूल को जाते भैया की जब पहली कॉपी फाड़ी थी
सीने से लगाकर भैया ने तब प्यार से थपकी मारी थी

बहनों ने हाथों में जब मेहंदी खूब रचाई थी
छिपकर भाभी के रंगों से हमने भी भरी कलाई थी
वो पापा के ट्रांजिस्टर के जब तर पुराने तोड़े थे
वो बचपन की दीवाली में जब खूब पटाखे फोड़े थे

जरा सी बात पर आँखे भिगोकर बैठ जाते थे
कहकर मेरा राजा बेटा पापा खूब मानते थे
वो बचपन के मीठे लड्डू जब मम्मी खूब बनती थी
वो बागों के मीठे अमियाँ जब दादी खूब खिलाती थी

वो रिश्तों की कच्ची पक्की बुनियाद पर खेला करते थे
वो बूढों के आदेशों को हम कैसे झेला करते थे
वो नासमझी के सुन्दर दिन कही फिर से लौट चले आते
आ जाती फिर प्यारी दादी और चोर सभी पकडे जाते
ajay singh
9792363733

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