सत्तावन की तलवारों से
मची ग़दर जब भारी थी
औरत बूढ़े बच्चे सब की
मिट जाने की तयारी थी
सबने आहुति दे दी थी
आई अब अपनी बारी थी
गोंडा वाले दीवानों को
माटी जाँ से भी प्यारी थी
घुटनों तक लम्बे हाथ लिए
जब राजा भी लड़ने आये
बच्चों से लेकर बूढों तक
कोई भी घर न रुक पाये
बीस हज़ार दीवानों ने
साथ कसम जो खाई थी
इधर उधर भागे गोरे
उन पर तो सामत आई थी
बांध कफ़न सर पे अपने
यहाँ खून से खेली होली थी
भारत की लाज बचने को
चल पड़ी आज फिर टोली थी
वो फज़त अली की गोली से
अंग्रेज कमिश्नर का मरना
फिर अपनी माटी की खातिर
वो अशरफ का जिन्दा जलना
घर घर जा करके राजा ने
हर मां से बेटे मांगे थे
उन बेटों के रणकौशल से
गोरे डर करके भागे थे
जब लमती में पलटनें सजी
तब राजा कहने आते है
गोंडा वाले हम है सपूत
माटी का मोल चुकाते है
हम उनमे से एक नहीं
जो अपने शीश झुकाते है
हम स्वाभिमान की रक्षा में
मारते है या मार जाते है
ढेमवा की मांद सुरंगों से
उन वीरों के हर अंगों से
आवाजें फिर से उफनायीं
चुप रहने तक लड़ने आई
फिर बरछी तीर कटारों से
उन वीरों की तलवारों से
खून की नदियाँ बाह निकलीं
उन बंदूकों की मारों से
जब गरजी सरयू पर तोपें
डर करके गोरे भाग चले
वीरों की घोर गर्जना से
बेचारे आगे नहीं मिले
आते गोरों की नावों पर
जब तोपों ने गर्मी उगली
जब वीरों की बंदूकों से
बस केवल मौतें ही निकली
वो बेलवा के बाईस हमले
वो लमती के खूनी किस्से
पूछो चर्दा की मिटटी से
वो वीर आज भी है मिलते
अपने में से ही कुछ भाई
गोरों से जाकर न मिलते
तो भारत माता के सपूत
अपनी जगहों से न हिलते
उस ग़दर की भीषण ज्वाला में
जिसने भी शंख बजाये थे
अपनी माटी के खातिर
जिसने भी शीश कटाए थे
आओ उनको हम नमन करें
जीना हमको सिखलाते हैं
वो हरदम जीने की खातिर
अमरों में नाम लिखते हैं
ajay singh
9792363733
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