Monday, 12 November 2012

गोनार्धचरित -लेखा जोखा गोंडा का

 हमारी सरजमीं पर एक कहावत है भैया पूत के पांव पालने  में ही दिखने लगते है,दरअसल यह कहावत पूत को पैदाइसी  प्रतिभावान बिलकुल नहीं कहती है बल्कि इस कहावत का अभिप्राय किसी भी समुदाय  के कल और आज  के मूल्यांकन से  है. कोई भी ब्यक्ति अथवा समाज  यदि अपने अतीत को अपने पुराने कपडे  की तरह उतार कर फ़ेंक न दे तो उसका आज उसके क़ल पर काफी कुछ निर्भर करता है,क्योकि  किसी भी ब्यक्ति का इतिहास उस ब्यक्ति के ब्यक्तित्व निर्माण में काफी अहम् है,संभवतः यही पूत के पांव और पालने की  असलियत  है   तो फिर आइये आज हम गोंडा जैसे क्षेत्र को  इस कहावत की शुद्धता पर मापते है
रामायण काल में भगवान राम की गायों के इस क्षेत्र में चरने आने के कारण इस क्षेत्र को गोनार्ध के नाम से जाना जाता था. गोंडा आज से लेकर आदि तक इतिहास में अपनी महत्वपूर्ण भागीदारी रखता है लेकिन शुरुआत आज से ही करे तो पाएंगे की विकास की दृष्टी  से यह क्षेत्र देश के अति पिछड़े जिलों में से एक भले हो किन्तु देश की सियासत में भागीदार बड़े बड़े राजनीतिक लक्ष्मीपतियों का बड़ा जमावड़ा यहाँ आज़ादी के बाद से ही निरंतर बना हुआ है . प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी ने पहली और दूसरी लोकसभा में गोंडा का प्रतिनिधित्व किया .प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने गोंडा बलरामपुर सीट  से अपनी राजनैतिक शुरुआत  की. तीसरी लोकसभा में आखिरकार चुनावी गड़बड़ियों की शुरूआती नींव गोंडा में रखी गयीं. इसे हम आज़ाद भारत में भ्रस्टाचार की शुरुआत कह सकते है . उत्तर प्रदेश सरकार में केबिनेट मंत्री कुंवर आनंद सिंह पिछले कई दसक से गोंडा की राजनीती को समर्पित है . गोंडा सदर  विधान सभा से विधायक विनोद कुमार सिंह उर्फ़ पंडित सिंह राज्य की  सपा सरकार में राजस्व मंत्री है.  भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष बाहुबली सांसद ब्रजभूषन  शरण सिंह एक दशक से भी अधिक इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व लोकसभा में कर चुके है . विकास पुरुष कांग्रेस सांसद माननीय बेनी प्रसाद वर्मा इस समय गोंडा के सांसद है और केंद्रीय इस्पात मंत्री है .

राजनैतिक आंकड़ों के धनी इस क्षेत्र में यदि विकास की गति को देखा जाय तो हमें पता चलता है की आज़ादी के बाद से इतने बड़े बड़े राजनेता जिस विकास की गाड़ी पर बारी बारी से सवार हो रहे है वह गाड़ी तो अंग्रेजों ने ही पंचर कर दी थी .और आज़ादी के बाद से ही इस क्षेत्र में माननीय  यह बता कर ही राजनीति कर रहे है, कि बस बहुत हो चुका इस बार हमें मौका दीजिये हम गाड़ी के सारे पहिये नए कर देंगे. प्रत्येक पांच सालों के अन्तराल पर  लाउडस्पीकरों से निकले हुए वादों से आख़िरकार यहाँ के लोगों का इतना  मोहभंग है कि उन्हें सच पर भी यकीन नहीं  है. आज गोंडा देश के अति पिछड़े क्षेत्रों में शुमार किया जाता है शिक्षा स्वास्थ्य सड़क और अन्य मूलभूत सुविधाओं कि हालत खस्ता है . क्राइम रेट के मामले में भले ही यह जिला प्रदेश के शीर्षतम जिलों में से एक बना हुआ है . बाढ  और सूखा से निपटने के लिए तो यहाँ के लोग दुनिया में सबसे आत्मनिर्भर है क्योकि उनका आत्मनिर्भर होना उनके लिए मजबूरी भी है और आत्मकर्तब्य भी .


राजधानी से लेकर गोंडा को जोड़ने वाले  राजमार्ग का तो यह आलम है कि सालों पहले जर्जर हो चुका बालपुर का  पुल आजतक नहीं बन पाया है जिसके लिए गोंडा के लोगों को लखनऊ तक जाने के लिए ३० किलोमीटर अतिरिक्त चलना पड़ता है , खैर कुछ भी हो  लोग अपने काम के साथ थोडा सैर सपाटा भी कर लेते है ,या हो सकता है कि सरकार का मंसूबा  टूटे हुए पुल कि मदद  से पर्यटन को बढ़ावा देना  हो .क्योकि पुल के बन जाने से लोग सीधे ही राजधानी पहुच जायेंगे . बरसात में  घाघरा की  तूफानी लहरें जब राजमार्ग को आँख दिखाती हुई जब उसके सीने तक चढ़ जाती है तो सरकार को इस बात का अंदाजा हो ही जाता है कि इस साल बरसात अच्छी हुई है .फसल अच्छी हुयी   तो किसानों पर थोडा बोझ  और डाला जा सकता है.करीब १५० साल पहले लार्ड कैनिंग ने अपनी बायोग्राफी में अवध के मध्यवर्ती क्षेत्रों को दुनिया का सबसे समृद्धशाली क्षेत्र कहा था क्योकि यहाँ कि जमीन खेती के लिए सबसे उपजाऊ थी .आज इसी माटी का किसान कर्ज के बोझ से डूबा है और आख़िरकार वह अपनी माटी से मोहभंग करके जीविका के अन्य साधनों के लिए  महानगरों कि तरफ देख रहा है.
एतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत कि दृष्टी से गोनार्धभूमि ने रामायण काल से लेकर ब्रिटिश काल तक अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराई है . आचार्य पतंजलि ,पाराशर मुनि ,गोश्वामी तुलसीदास  जैसे महापुरुषों कि श्रंखला इसी माटी से जुडी है.भगवान वाराह के अवतार स्वरुप वाराह मंदिर कि प्राचीनता इसे और अधिक गौरवशाली बनाती है. रघुवंशी महाराजा दिलीप द्वारा स्थापित काली भवानी मंदिर , महाभारत काल में पांडवों द्वारा स्थापित पृथ्वीनाथ मंदिर ,पंचारन्य वन ,विख्यात शक्ति पीठ देवीपाटन , दुखहरण नाथ मंदिर , हनुमान गढ़ी, खैरा भवानी मंदिर  सुरसा मंदिर गोनार्ध्भूमि को और अधिक गरिमामयी बनाते है.मुगलकाल में गोंडा ने भयावह प्राकृतिक आपदा झेली जब खोरहसा रियासत के आसपास कि जमीन का एक बड़ा भू-भाग राजमहल के साथ जमीन में धंस गया जिसे हम आज पथरी झील के नाम से जानते है.  इल्तुत्मिस का बेटा मालिक एनुद्दीन गोंडा का सूबेदार हुआ करता था.अकबर के समकालिक यहाँ बड़ा शोर शराबा हुआ ,शेर शाह सूरी   स्वयं ही विसेनों का राजतिलक करने गोंडा आया और फिरोज शाह तुगलक अपनी महत्वाकांक्षा को लेकर ६ महीनों तक यहाँ जमा रहा . अंग्रेजों के खिलाफ प्रथम स्वाधीनता संग्राम में गोंडा के महाराजा देवी बक्श  सिंह के नेतृत्व में इस भूमि ने संपूर्ण भारत  कि अंतिम साधना भूमि होने का गौरव प्राप्त किया.दिसंबर १८५९ तक राजा के २०००० लड़ाके अंग्रेजों के खिलाफ अपने जान कि बाज़ी लगाते रहे.

काकोरी कांड के मुख्य अभियुक्त राजेंद्र नाथ लाहिड़ी गोंडा जेल में हँसते हँसते फाँसी के फंदे  पर झूल गये.मनकापुर के लल्लन साहब नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की  पार्टी फारवर्ड ब्लाक  के अवध के अध्यक्ष थे.
सैकड़ों साल पहले गोंडा के महाराजा राम सिंह ने गोंडा नगर को मथुरा और वृन्दावन के प्रतिविम्ब  स्वरुप बसाया और नगर के मध्य  कई तालाब खुदवाए वो सभी आज गोंडा की  सारी गंदगी अपने दामन में समेटे हुए  हैं. आसमान छुते राजा गोंडा के जगमोहन  महल के हौसले अब पस्त होने को हैं जबकि गोंडा के ३४ लोग अपनी विरासत को तितर वितर होते  शायद इसलिए  देख रहे है क्योकि वो तो रोटी कपडा मकान में उलझे हैं .सैकड़ों साल पहले जिस गोंडा नगर को लखनऊ नवाब के विशेष अतिथियों कि मेहमान नवाजी का मौका मिलता था उसी गोंडा नगर को अमृतलाल नगर ने दरिद्र कहा ,२००१ में बी.बी.सी. रेडिओ की टीम गोंडा आई और उस टीम ने टिप्पड़ी की ''दुनिया बदली गोंडा नहीं बदला '' तो २१ सदी के प्रसिद्द शायर अदम गोंडवी ने अपना शायराना अंदाज कुछ इस तरह दिखाया.


                                                 "महज सड़कों में गड्ढे है न बिजली है न पानी है
                                                 हमारे शहर गोंडा की फिजा कितनी सुहानी है "  

जनसँख्या की दृष्टी से गोंडा पनामा जैसे देशों से भी बड़ा है . भारत के ६४० जिलों में से ९५ वाँस्थान रखता है .विकास की दृष्टी से गोंडा देश के १०० अति पिछड़े जिलों में से एक है .साक्षरता दर समूचे देश की तुलना में भी ५% कम है, मानव विकास सूचकांक ,शिशु मृत्यु दर तथा स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में भी यह जिला फिसड्डी ही है
अब सवाल यह उठता है की  इतने गौरवशाली इतिहास के बावजूद आज गोंडा  के लोग  देश में पिछड़ेपन का पर्याय क्यों बने हुए है क्या  वो अपना अतीत भूल चुके है या वो इतिहास की कीमत चुका रहे है.यदि हाँ तो निश्चित ही यह  उनके पुरखों का अपमान है.साथ ही साथ गोंडा के ३४ लाख लोगों के लिए एक चुनौती भी है  ,क़ि वो अपने पुरखों के  गौरवशाली इतिहास को गरीबी और पिछड़ेपन से जोड़कर उनके  मरणोपरांत उन्हें शर्मिंदा न करें.

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