प्रिय मनमोहन , आज भरत वंशियों की दुर्दशा देखकर मेरा मात्र ह्रदय कराह उठा, मेरे 121 करोड़ बच्चों में कुछ मुट्ठी भर लोगो को छोड़कर बाकि लोग अपने ही घर में रोटी कपडा मकान के लिए संघर्ष कर रहे है, आज मेरे आधे से ज्यादा बच्चे 26 रुपये कमाकर भी बड़ा आदमी नहीं बन पा रहे है तो मेरे ही कुछ जिम्मेदार बच्चे अपने मेहमानों को आठ आठ हज़ार की थाली परोस रहे है , 26 रुपये प्रति दिन कमाने वाले बच्चों की सूनी थाली देख कर एक माँ का ह्रदय आज खून के आंसू रोया लेकिन इतना ही नहीं जब मैंने अपने उन भूखे बच्चों की तरफ ध्यान किया जो 26 रुपये भी नहीं कमा पा रहे है तो तुम ही सोचो मुझ पर क्या बीती होगी ? तुम्हारे ही कुछ सहयोगियों ने एक बाद एक मेरे सभी गहने बेच डाले पर मैंने कभी तुमसे कोई शिकायत की ? किन्तु अब मुझमे और धैर्य नहीं बचा है क्योकि मेरे आभूषण बेचने वाले मेरे ही कुछ बिगडैल बच्चे अब मेरे गरीब बच्चों पर महगाई के बम दाग रहे है। प्रिय मनमोहन इन बिगडैल लोगों की थोडा तुम ही समझाते क्योकि उनको समझाना तो मेरे बस में रहा नहीं , वो तुम्हारी सुनते है , तुम्हारी बात जरुर मानेंगे , इसे तुम अपनी भारत माता की विनती ही समझना क्योकि मै अपने गरीब बच्चों को भूखा नहीं देख सकती।
अरे हाँ एक बात पूछना तो भूल ही गई , यह मै क्या सुन रही हूँ ,कुछ लोग तुम पर भी मेरे कुछ गहने चुराने के आरोप लगा रहे है ,अब तुम ही बताओ अगर मै उन लोगों की बात मान लू तो आखिर मै किस ओर को जाउंगी। नहीं नहीं मै यह नहीं मान सकती की मेरा सबसे जिम्मेदार बेटा बिगड़ गया है क्योकि वह तो मेरे प्राण तुल्य है ,और मै यह तो मानती ही हूँ की मेरे बच्चे कितने भी बिगड़ जाय कम से कम अपनी भारत माता के प्राणों से कोई समझौता नहीं करेंगे. मेरे बच्चे अपने पुरखों के शौर्य को भूले थोड़ी है जिन्होंने मेरी अस्मिता की रक्षा के लिए अपने सर कटवा दिए आखिर इनकी रगों में लहू बन कर दौड़ रहा खून मेरा ही तो है ,इतना दूषित नहीं हो सकता।
बस एक मन की ब्यथा कहू प्रिय मनमोहन ; कभी कभी मुझे मेरे वो बच्चे मिल जाते है(शहीदों की आत्मा ) जिन्होंने इस मात्रभूमि के लिए अपने प्राण गवाये है तो आज की दुर्दशा देखकर वो मुझसे लिपटकर रोने लगते है और मै उन्हें अपने सीने से लगाकर चुप कराती हू और अपनी आँखों में आँसू रोके हुये कहती हूँ की घबराओ मत बेटा सब ठीक हो जायेगा। अभी कल ही मुझे आमतौर पर शान्त रहने वाला और हमेसा अहिंसा की बात करने वाला गाँधी मिला, अपने टूटते हुए सपनों के भारत को देखकर काफी गुस्से में था , उसने तो अपने सपनो के भारत का सारा सिधान्त व् साहित्य ही जलाकर राख कर डाला,आगे बढ़ी तो मैंने देखा की मेरी आज़ादी के लिए खुले आम खून मांगने वाले मेरा दुलारे सुभाष की आँखों में इतनी हिंसा भरी थी की कही उसका वश चलता तो वह आज मेरी अस्मिता की रक्षा के लिए अकेले ही दुनिया से लड़ जाता , कभी कभी तो मेरा भी मन यही कहता है की कही आज मेरे ये बच्चे होते तो मेरी यह हालत देखकर समूचे ब्रम्हांड में उथल पुथल मचा देते। खैर कुछ भी हो .. मैंने उन दोनों को समझाया की बेटा थोडा धैर्य रखो अभी भी मेरे कुछ बच्चे है जो मेरे लिए चिंतित है जिस दिन उनका अनुकूल समय हुआ वो मेरे सभी दुश्मनों का जडमूल से नाश कर देंगे।
प्रिय मनमोहन कुछ दिन पहले तो तुमने मुझपर बड़ा वज्राघात किया जब मेरे लिए चितित मेरे कुछ इमानदार बच्चो ने इस भारत भूमि के मुखिया होने के नाते तुमसे हजारों सवाल पूछा और तुमने सवालो का लाज रखते हुए अपनी खामोसी को बेहतर समझा (हज़ार जवाबों से बेहतर है मेरी खामोसी न जाने कितने सवालों की लाज रखी - मनमोहन सिंह ) तुम्हारे इस जवाब ने तो मुझे झकझोर कर ही रख दिया। क्योकि उस दिन या तो तुम अपने कर्तब्य से भाग रहे थे या फिर तुम्हारी भी नियत में खोट थी। मेरे हजारो हज़ार सालो के इतिहास में ऐसा मूक योद्धा तो मेरी कोख में नहीं हुआ था। मनमोहन मेरी अस्मिता की रक्षा के लिए मेरे बच्चों ने यूनानियों से लेकर अंग्रेजों तक 2500 साल लगातार लड़ाई लड़ी है अगर कही आज के दिन का जरा सा भी पूर्वानुमान मुझे होता तो मै अपने करोडो बच्चों को अपने लिए जान की बाजी न लगाने देती. मुझे क्या पता था की 15 अगस्त 1947 को अंग्रजों की बेड़ियों से आज़ाद होने के बाद मुझे अपने ही बच्चों की बेड़ियों में कैद होना पड़ेगा।
प्रिय मनमोहन इतनी कटुता का सिर्फ एक मतलब है की मेरे सारे बच्चे सुखी रहे,कही यही कटुता मेरे गरीब बच्चों ने अपने मन में रख ली तो मै उस स्थिति में आपसी संघर्ष की कल्पना करके डर जाती हूँ ...,मेरे अन्दर एक माँ का ह्रदय है और अभी भी मेरी उम्मीदें तुम पर टिकी है ,मुझे यह पूरा विश्वास है की एक दिन तुम अपनी जिम्मेदारी समझोगे और सारे हालात संभाल लोगे .....................तुम्हारे जवाब की प्रतीक्षा में
Ajay Singh
09792363733
No comments:
Post a Comment