शोरगुल सुनते हुए
गजले समझ में आ गयीं
वो खेल कूद की ललक
बढती उम्र ही खा गयीं
और फिर आ ही गए
दहशत भरे वो दिन
बचपन की बातें हो चलीं
बूढी बताये बिन
मौज मस्ती खूब की
सावन के झूले झूलकर
कितना दीवाना खुश हुआ
बूढों की बातें भूलकर
खेला किये सब भूलकर
जेठ की उस धूप में
सब दर्द हो जाते फ़ना
दादी की झूठी फूँक में
अब जिन्दगी बेख़ौफ़ सी
आई है करने को हिसाब
मुझको बताओ आज तक
तुमने पढ़ी कितनी किताब
मै भी तो हू बेख़ौफ़ सा
बस चूर अपने आप में
निकला निडरता को लिए
इस जिन्दगी के ताप में
दोस्तों अब २३ का हो चला हू... और जिन्दगी ने अपने रंग दिखने शुरू कर दिए है. ग़ज़लें समझ में आने लगी तो डर लगा शायद मै बड़ा हो गया. चूंकि अभी अभी बचपना गया है इसलिए यकीन मनो डर तो लग ही रहा है, लेकिन ..मान नहीं सकता क्योकि कुछ भी नहीं है मेरे पास, .. डर से लड़ने को.......... सिवाय हिम्मत के ............................
अजय सिंह बीरपुर बिसेन दर्जीकुआ गोंडा
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