Thursday, 22 December 2011


       गोंडा 

यह जमीं वही है पुरखों की 
जिनको "गोंडेश"बुलाते थे 
अस्सी कोसों तक के राजा
करके शीश झुकाते थे 

वो रघुकुल गोनार्ध यही 
यहाँ राम भी पढने आते थे 
इस माटी में रहते रहते 
खरहे भी शेर हो जाते थे 

यह तुलसी की धरती है 
यहीं मानस पाठ रचाया था 
आचार्य पतंजलि ने पहले 
यही योगसूत्र सिखलाया था

पूछो बांसी के महलों से 
ये राजपूतानी धरती है
परिणाम भले चाहे जो हो 
जो कहती है वो करती है 

गोंडा के महलों दुर्गों ने
 गोरों के गोले खाए है 
यहाँ भारत माता की खातिर 
बेटों ने शीश कटाए हैं

जहाँ जिगर गोंडवी रहते हों 
लाहिड़ी की जय जो कहते हों 
जिस मिटटी में अटल हुए 
बागी के कितने कतल हुए 

इतिहास प्रसिद्ध ये गोंडा है 
दुश्मन जिससे शर्मिंदा  है 
बच्चो बच्चो और बूढों के 
रग़-रग में भारत जिन्दा है 

                                     Ajay singh

1 comment:

  1. सत्तावन की तलवारों से
    मची ग़दर जब भारी थी
    गोंडा में बूढों बच्चों की
    मिट जाने की तयारी थी

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