Tuesday, 25 March 2014

अब मुल्क की माटी रगड़कर धो ली है......



जिंदगी तू हमसे कितनो खेल खेली है.......
पर हमको तू मासूम लगती है ,और भोली है
क्यूकि हमही थे जो आजतक तुझको समझ बैठे
वरना कितनों ने खेली यहाँ खून की होली है
तू समझती थी कि तेरी मखमली सी  बांह पर
हमने बिछा  दी गरदने,.........  पुरुषत्व खाली है
पर तू नहीं समझी रगों बह रहे  रक्त्त को .......
इस रक्त्त ने पुरखों की जीती दौड़ पा ली है .......

मत समझ की हम भी तुझ पर मर मिटे है
तुझसे नहीं महफूज मेरे वतन की टोली है
तेरी जो छीटें आजतक मुझ पर पड़ी थी
अब मुल्क की माटी रगड़कर धो ली है

तूने बहुत कमजोर करके रख दिया है हुस्न से
इतिहास के पन्नो में कितना नाम खाली है
जब मुशकिलों से घिर रहा मेरा वतन मेरा चमन
मेरे लिए बेकार अब होली दीवाली है..................


Sunday, 23 March 2014

भारत तेरे उन बेटों को …इतिहास बदलते देखा है



भारत तेरे उन बेटों को …...................... .. .
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इतिहास बदलते देखा है
उन युद्धों  के  मैदानो में , हर रोज निकलते देखा है
बस बात जबानी पर हमने, लोगों को मिटते देखा है
हाथी घोड़ों की  फौजों को..  प्यादों से पिटते देखा है.
जिनकी विजयी हुंकारों से पर्वत के सीने फटते थे
दुश्मन जिनकी तलवारों पर गाज़र मूली से कटते थे
योद्धा तेरे वो गये कहाँ जिन पर तू दावे करता था
वो कहाँ गया बेटा तेरा जो हँसते हँसते  मरता था
जो कफ़न बांध  चलते थे, जो तूफ़ानो में पलते  थे
वो कहा गए बेटे तेरे जो अंधियारों में जलते थे
ऐसे बेटे फिर पैदा कर जो इतिहास बदलते हो
जो अपना शीश कटाने को खुद मैदानो में चलते हो